tapasvi

Gurudev shri badri prasad ji maharaj was born in Rindhana. Your father’s name was Gangaram and mother’s name was Chandravali. You took responsibilities and became proficient in managing the family business very soon.

You get married to Bhulla devi and were blessed with a daughter who could not even open her eyes to see this world. Thereafter you were blessed with elder son Prakash and thereafter prasad however, bhulla devi was called back to heaven by almighty when younger prasad was only six days old.

चिरपरिचित श्रद्धा तथा आराध्य आराधना का परिचय सुलभ नाम है श्री बद्री प्रसाद जी महाराज। आपका जन्म रिंढाना ग्राम की धर्म सेवा परायण भूमि में हुआ।

पिता थे गंगाराम माँ थी चन्द्रावली। तपस्वी जी महाराज का बचपन कला कौशल प्रतिभा संपन्न था। मुनीमी पढ़ी और पिता की असस्थ्ता के कारन व्यापर में जुट गए और तेरह वर्ष में ही फर्म का पूरा दायित्व निर्वहन करने लगे। तपस्वी जी महाराज ने अपने जीवन को संस्कारो से सदेव सुवासित किया। पर्द्रह वर्ष की उम्र में कच्ची हरी का त्याग और रात्रि चोविहर का प्रत्याख्यान उनकी आध्यात्मिक रूचि का प्रतिक है। शादी कह्सुन ग्राम वासिनी भुललो देवी के साथ हुई।

पहले एक पुत्री हुई जो आँख खोलने से पहले ही परलोक वासिनी हुई फिर एक पुत्र का प्रकाश – प्रकाश के बाद प्रसाद। प्रसाद की अत्यधिक ख़ुशी में लिपटा एक चिरंतन अवसाद मिला अर्थात लघु पुत्र राम प्रसाद के छटी की रात को दुःख की रात छा गयी। भुल्ला देवी दिवंगत हुई। दुःख या विरह ही इंसान को वज्र बनता है। इंसान से वज्र बन्ने का श्री गणेश हुआ। बच्चो के लालन पालन का दायित्व रिश्तेदारों के हाथों में सोंपा और शिक्षण की व्यवस्था की गुरुकुल पंचकुला में पर मन में अध्यातम का सूत्रपात हो चूका था। बच्चो के सरल शिशु मन में गुरुदेव की तस्वीर उतारते रहे। उनकी साधना के श्लोक सुनते रहे। वाचस्पति गुरुदेव इस खानदान के कुल गुरु थे। एक दिन अपनी किताबो का हिसाब किताब मिलाते व्यापारी बद्री प्रसाद ने रोकड़ गिनने में सहायक प्रकाश चंद की और देखा और पास में मस्ती से झूमते राम प्रसाद के तेजस्वी भाल को पढ़कर पूछ लिया मेरा मन मुनि बनने का गुरुदेव की शरण स्वीकारने का है तुम्हारा क्या ख्याल है। बच्चो ने सहज में कहा हम तो आपके विचारों के सतत अनुगामी है। इसके बाद नारनौल में 18 jan 1945 गुरुवार के दिन गुरुपदवाची बन गए।