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Bhagwan shri Ram Prasad Ji maharaj was born on 9th May 1930 in Rindhana. Father’s name was Shri Badri Prasad Jain and mother’s name was bhulla devi. Your mother left you for her heavenly abode when you were only six days old.

जन्म: 9 मई, 1930, रिण्ढ़ाणा (उकलाना)
दीक्षा: 18 जनवरी, 1945 (नारनौल)
स्वर्गारोहण: 18 जुलाई, 2007 (गोहाना)

जन्म:- आपका जन्म भारत भू के गौरव हरियाणा प्रदेश के सोनीपत जिलान्तर्गत तहसील गोहाना के गाँव रिण्ढ़ाणा में जैन धर्म के पीपलराय कुल के गौरवशाली वीर सपूत, सेठ गंगा राम जैन के आत्मज श्री बद्री प्रसाद की धर्मसहाया श्रीमति भुल्लां देवी की कोख से 9 मई, 1930 वैशाख सुदी द्वादशी मंगलवार के दिन उकलाना मंडी में हुआ। जब आप मात्र छः दिन के ही थे कि कुदरत ने माँ का दूध और गोद दोनों ही छीन लिए। पिता ने माँ का भी भाग अदा किया। हर तरह से संरक्षण परिवर्धन दिया। संस्कार पुरोधा को नमन।

शिक्षा- आपके पहले गाँव में व बाद में पिताश्री ने संस्कार शिक्षा एवं धार्मिक बीजारोपण हेतु गुरूकुल पंचकूला में भेजा। आप कुशाग्र एवं तार्किक बुद्धि के प्रज्ञाशील मनीषी प्रारम्भ से रहे। आपकी चिन्तन क्षमता की गहराई इसी से अमाप एवं अतुलनीय हो जाती है कि गुरूकुल के वार्षिकोत्सव पर स्व-निर्मित भावपूर्ण कविता सुनाकर तालियों की गड़गड़ाहअ एवं शिक्षक वर्ग का भरपूर आर्शीवाद प्राप्त किया। प्रतिभा की पहली प्रशस्ति पर हस्ताक्षर किए। सरस्वती पुत्र को वंदन।

दीक्षा:- पितृदेव श्री बद्रीप्रसाद जी ने पत्नी देहावसान पर जलते अंगारों की दहकती चिता पर पुनर्विवाह न करने की भीष्म प्रतिज्ञा का वज्र मंत्र पढ़ा पुत्र-परिपालना की ममतामयी वीभिषिका दिखलाकर लोगों ने – संबंधित जनों ने – परिजनों ने वज्र पुरूष की प्रतिज्ञा को शिथिल करने के महाप्रयास किए जो सिरे नहीं चढ़ सके। उनका मानस मंथन संसार त्याग एवं भविष्य के लिए दो ब्रह्मा-पुत्रों की अवतार कल्पना एवं अनंत यश की सुन्दरतम सौभाग्य रेखाओं को पहचान रहा था। पुरूष सिंह ने वंश की गरिमा को गौरवान्वित करने का बीड़ा उठाया। पुत्रों ने पिता की हर इच्छा को अधिमान देकर पितृभक्ति एवं पुत्र गौरव को सफल, धन्य एवं पवित्र किया। यह अनन्य उदाहरण मिसाल है। संयमी साधक को प्रणाम।

दीक्षा-स्वनामधन्य:- विश्वविभूति व्याख्यान वाचस्पति गुरूदेव श्री मदन लाल जी म. के श्री चरणों में 18 जनवरी, 1945 वीरवार को देहली चाँदनी चैक की भरी-पूरी छŸाी ऋद्धि भाई दुलीचन्द जैन को सौंपकर तीनों पिता-पुत्रों (श्री बद्री प्रसाद जी पिता, सेठ प्रकाश चंद्र जी – एवं श्री रामप्रसाद जी) ने दीक्षा अंगीकार कर साधना के स्वर्णिम समय की भाग्य रेखा पर कुंकम लगाया। उसी दिवस से मुनिपंुगव श्री राम प्रसाद जी, विश्व वल्लभ, जन-मन वल्लभ के मूल मंत्र की आदि शक्ति बन गए। शत-शत वंदन।

व्यक्तित्व का विकास:- आपने सर्वधर्म ग्रन्थों सूत्र-सिद्धान्तों एवं भाषा विज्ञान के साथ अन्यान्य साहित्य विधा का सूक्ष्म एवं तलस्पर्शी अध्ययन प्रारम्भ किया। व्याकरण के आप अधिकारिक एवं न्याय के सर्वमान्य विद्धान बने। सरस्वती आपकी जिह्वा तथा प्रज्ञा की अधिष्ठात् शक्ति पीठ बन गई। धर्म-दर्शन आपकी सोच थे, भाषा आपका शौक था। परिचय आपकी वरदायी संजीवनी थी। नम्र-सरल-विनीत प्रकृति के करूणा पुरूषा को जनता ने-राम कहा तो आपने सबको प्रसाद कर ष्रामप्रसादष् नाम की सार्थकता पर अमरता की मोहर लगा दी। आप जहाँ भी जब भी पधारे उधर ही आपकी अमिट छाप व छवि हर दिल पर स्मृति बनकर छा गई।

वरदायी युगपुरूष:- आपको 20वीं एवं 21वीं सदी का वर्धमान माना जाता है। आपके त्याग-वैराग्य संयम चरित्र की सफटिक-सी पारदर्शिता ने सरल, सौम्य हंस सी नीरक्षीर निर्णायक मनीषा ने, गरीब अमीर के प्रति समभाव दृष्टि ने, सभी का अपना बनाया। आपको अन्जान-निर्धन-गरीब एवं असहाय का शरण-स्थल एवं संत माना जाता है। आप गरीब का धन थे, यौवन का संस्कार थे, वृद्धों की आशा थे, अमीरों के नियन्ता थे, बच्चों में बच्चे तथा समय की हर धड़कन के स्वर को पहचान देते थे। साध्वाचार में छलछंदों की चैपड़ के आप कभी समर्थक-दर्शक या खिलाड़ी नहीं रहे। आप ने हमेशा जहर पी कर अमृत का रसास्वाद चखा। आपकी मिलन सारिता एवं उदारता के साथ निर्णायक क्षमता बुद्धि ने सभी को चरणानुगामी एवं चरण सेवी के साथ प्रशंसक एवं सदा-सदा के लिए आपका बना दिया। आप से सभी संतुष्ट थे। आप संजीवनी थे, अमृत पुरूष थे, हर मन की आवाज थे। श्रद्धा देव को नमन।

जहा अंतो तहा बाहो:- आप इस शताब्दी के वो विरले संत रत्न हुए हैं जिनका जीवन अन्दर/बाहर से एक था। छद्म प्रवृति एवं नकली चेहरों/मुखोटों के साधुत्व से आप कोसों दूर थे। आपने जो कहा वही किया, जो किया वही कहा। आचार पालन में आपकी सुलझी समझी दृष्टि का दूसरा सानी नहीं। आप अपने ज्येष्ठ गुरूभ्राता संघशास्ता श्री सुदर्शन लाल जी म. के शिष्यों में ज्ञान दान, संयम दान, शिक्षा दान, संस्कार दान के निर्लेप ब्रह्मा बने। आपने गुरूभ्राताके लिए वंशदान कर सर्वस्व दान की बलिदानी-शहीदी परम्परा की नींव रखी। गुरू गोबिन्द सरीखी सर्वस्व दानी परम्परा को इस युग में नया परिचय दिया। श्गुरूभाई के शिष्य ही मेरे शिष्य हैंश् – इस उदार दृष्टि ने आपकी सोच को स्वर्णिम ही नहीं हीरक रूप दिया। आप गौतम से विनीत, सुधर्म से संघ संस्थापक, संरक्षक, नंदीषेण से सेवाभावी तथा अंत में धन्ना अणगार से चरम तपस्वी साबित हुए।

कुश देह में महापुरोधा:- आपको 1999 से हृदयघात की वेदना के साथ 24 मई, 2002 सोनीपत बद्रीधाम में पक्षाघात की वेदना का स्पर्श हुआ, पर आपने अपनी क्षमता एवं निर्णायक प्रज्ञा को अविराम अभिरामता दी। आप सुकोमल मानस के साथ फूल सी नाजुक देह के खूबसूरत सन्त थे। हंस सी मस्तानी चाल, उदग्र कम्बू ग्रीवा, वृषस्कन्ध, आजानु भुजाएं – उन्नत गौरवान्वित देदीप्यमान ललाट ने युग पुरूष परिचय का सुन्दर रूप है। भीतर मंे करूणा से धड़कता है भीगा दिल, भक्तों की आँखों के आँसुओं को वरदान से खिलखिलाहट देने की अद्भुत क्षमता, कीड़ी पर करूणशील मन संथारे जैसे संगर की हथेली पर रास रचाने का साहस आपकी देह को अमरता दे गया। संथारे हेतु कमजोर सा दिखाई देने वाला महामहिम संत पिता की तरह आग को आबे जम जम बनाकर पी गया। सभी ने एक ही स्वर से कहा – युगपुरूष को नमन। संलेखना-संथारा:- पितृदेव भीष्मपितामह-वज्र साधक संकल्प एवं वरदानों के अदभूत मसीहा, चमत्कारी युगपुरूष श्री बद्री प्रसाद जी म. के 5 अगस्त 1987 से 16 अक्तूबर 1987 तक के संथारे के आप निर्यापक रहे। आपने अपनी गज़लों-कविताओं एवं लेखों में संथारे का समर्थन एवं स्तुतिगान किया। जिसे हम बहुत दूर की गोटी मानते थे। आपने उसे निर्मोह-निर्लेप एवं लौह दिल से पूरा कर दिखलाया। आपका संलेखन संथारा कौम की जान को जज्बातों से भर गया। उससे आप संयमी, सरल, विद्धान, वरदायी, चमत्कारी, परदुखकातर करूणाशील साधक के महतो महीयान रूप को समेटे थे। उस स्वर्णिम परम्परा को 11 जुलाई प्रातः 10:15 पर पहल संलेखना तथा 16 जुलाई रात्रि 8:40 पर संथारा ग्रहण कर संलेखन-संथारा परम्परा को स्वर्णिम एंव महिमा मंडित कलश से नवाजा। आपने भीतर में पल रही पवित्र आस्था को पूर्णता देकर पूर्णसाधक की सम्पूर्ण व्याख्या कर दी। आपके संलेखन का यह अद्भुत नजारा जिसने भी देखा वह शताब्दियों तक अपनी पीढ़ियों को सुनाएगा तथा आपके नाम का माला जाप अखण्डित रूप में जपता रहेगा। संथारा साधक मुनि रामप्रसाद जी म. धन्य हैं।

विचित्र संयोग:- आपका जन्म 9 मई, दीक्षा 18 जनवरी (1$8त्र9) तथा तपस्वी राज की धारा 16 संथारा पूर्ति तारीख को संथारा ग्रहण, 18 जुलाई (1$8त्र9) को स्वर्गारोहण आपकी 9 अंक की अकाटयता अखण्डता, पितृभक्ति एवं महनीय शक्ति की याद ताजा कर गया। आप संयम में अखण्डित, ज्ञान में पूरे, चारित्र में हीरे, मन से सुदृढ़ तथा संथारे में संपूर्ण निकले। पुरूष की पुरुषोत्तम छवि को शत-शत नमन। संथारे के निर्यापक:- मायाराम गणीय गच्छाधिपति गुरूदेव वचनसिद्ध, मौनी-बाबा, सेठ प्रकाश चंद्र जी म. की निर्मोह – मनस्थिति भ्रातमोह-विजेता-शक्ति, आपके हनुमान एवं सर्वथा समर्पित, पुत्रवत-शिष्य, लब्धिपुरूष, शेरे-हरियाणा, ष्तपस्वीष् श्री सुन्दरमुनी जी म. की सूझबूझा एवं प्रज्ञाशीलता के साथ सुशील मुनि जी म., श्री संयति मुनि जी म., श्री शुभम मुनि जी म., पंजाब कोयल महासाध्वी श्री मीना जी म., श्री मुक्ता जी म., श्री महक जी म., श्री मुमुक्षा जी म., श्री समर्थ श्री जी म. ने जो साज दिया वह अद्भुत है। आर्यवज्र स्वाध्याय संघ, टी.पी.एस. पब्लिक स्कूल परिवार, सम्पूर्ण गोहाना श्री संघ एवं तपोधनी नवयुवक मण्डल गोहाना एवं सभी युवकों की कर्मठता कार्यक्षमता से सम्पादित हुआ। सम्पूर्ण भारत, देश-विदेशों के साथ जैन अजैन जनता ने जो संलेखना संथारे की स्तुति एवं गौरव गाथा को अभिराम समर्थन दिया वह आपके गौरव को अमर रूप दे गया है।

एक युग का अन्त:- आप स्वयं में एक इतिहास पुरूष थे। आपने अपने व्यक्तित्व, कर्तव्य-संयम-शील-स्वभाव से कलियुग में सतयुग का नींव पत्थर रखा। आपके हाथ में उभरी सौभाग्य रेखा को गणितज्ञों एवं भविष्य दृष्टाओं ने भगवान के रूप में देखा। इस युग में बालजति-बालयोगी-कामना-वासना से अछूते, सरल सात्विक मन के महर्षि श्री रामप्रसाद में भगवान की छवि के साक्षात् दर्शन किए। आप स्वयं में एक युग थे। बड़े-बड़े आचार्य-उपाध्याय-साधुवर्ग के साथ अन्य धर्मों के धर्म गुरूओं ने आपके भंते भगवन शब्द से आदर दिया, आपको भगवन कहकर पुकारा ष्भगवनष् सम्बोधन आपके साथ जुड़कर धन्य हो गया। हे करूणा दया सिन्धु आप अपने साथ एक युग ले चले हैं। इस धरतीसे खुद ही चला जा रहा है। आओ हम सब आस्था पुरूष को विदा देने से पूर्व इनके आदर्शों को स्वयं में उतारने का प्रण ठान लें। आपक का दर ष्भगवन श्रीष् भक्तों को मक्का, मदीन, हरिद्वार, कांशी, प्रयाग, येरूशलम बन जाएगा। तुम यादों में अमर हो गये हो। अमर भगवन रामप्रसाद जी म. को शत-शत वन्दन।