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1. 24 Tirthankar

2. Bhagton ko kiya nihal

3. Bhagvan tera darbar laga hai

4. Guruwar uttam var do

5. Kehne ki nahi hai baat

6. Jai jai jai bhagwan

संथारे की कहानी जब भी जुबां पे आये मुनिवर का चित्र सुन्दर आँखों में खिचता जाए || टेक ||

1. की देह ने बगावत , बागी बने वो उससे
रूठे तो रूठने दो अब कोन मुंह लगाये

2.धड़कन बढ़ी थी दिल की फिर दिल हमारे धड़के
रत्नो का ये खजाना कोई किस तरह बचाये

3. नौका ही जब हो टूटी कैसे वो अब चलेगी
उस को खुदा पे छोड़ा और खुद में ही समाये

4. गुरुवर मदन मुनि जी , गुरुभ्राता श्री सुदर्शन
की वंदना में मस्तक तन मन नयन झुकाये

5. हम को बुला बिठाया संथारा तुम कराओ
हम ने भी आज्ञा मानी आंसू नहीं बहाये

6. अगले ही दिन वो व्याधि उपशांत हो गई थी
कितना है शेष जीवन अब कौन ये बताये

7. आराधना हो उनकी कर्तव्य अपना समझा
स्वाध्याय और समाधि के पाठ सब सुनाये

8. करते प्रतिक्रमण वो जब बैठ कर स्वयं थे
दिखता था इक नजारा विश्वास कौन लाये

9. दर्शन के हेतु कितनी दुनिया उमड़ पड़ी थी
हुए धन्य वो जिन्होंने दर्शन किए कराये

10. सीने थे सब के भारी नाम हो रही थी आँखे
श्रद्धा के पुष्प सब ने दीदार में चढ़ाये

11. दिन हो गए बहतर सूखा था, कतरा कतरा
वो भीष्म से पितामह पा मौत मुस्कराये

श्री तपस्वी जी मा. की अंतिम शिक्षा

मेरे मुनिओं i मेरी सुनियो, तुमसे कुछ कहकर जाना है |
    पहले मानी, अब मानोगे, मेरे मन ने यह मन है || टेक ||
चाहे तप थोडा ही कर लो, संयम को प्रमुखता देनी है |
     तप तो गृहस्थ भी कर लेते, संयम की ऊँची श्रेणी है |
          संयम के लिए है घर छोड़ा, उस को ही लक्ष्य बनाना है ||
दीक्षाएं चाहे थोड़ी हों, जो हों वो सफलता दिखलाएं |
     केवल संख्या पूर्ति से ही, नहीं अपने दिल को बहलाएं |
          एक आता है, एक जाता है, ऐसे न तमाशा बनाना है |
रिश्तेदारो के पोषण में, उनकी मुश्किल हल करने में |
     यदि लगे रहे उनकी ममता के, रंग जीवन में भरने में |
          इससे गृहस्थ रहना अच्छा, संयम तो मात्र बहाना है ||
वो प्रेम हो आपस में तुममे, जिसमे किंचित भी स्वार्थ न हो |
     बचना उन व्यर्थ कि बातों से, जिनमें सुनिहित आत्मार्थ न हो |
         हो संघ समाज की रक्षा कुछ, ऐसा भी भार उठाना है ||
बचना नारी सम्पर्को से, पढ़नी आगम की वाणी है |
     आडम्बर और दिखावो से, होती संयम की हानि है |
          विद्वान बनो, क्रियावान बनो और निस्पृह बन दिखलाना है ||
भोजन निर्दोष हो, सादा हो जिव्हा के नहीं गुलाम बनो |
    आवश्यकता कम हो अपरिग्रह की मूर्ति अभिराम बनो |
          जो मर्यादा गुरुओं की रही जीवन में उसे निभाना है ||

हे जीवन सर्वस्व हमारे
दयाशील भक्तों के प्यारे
तपोधनी संयम कि प्रतिभा
नहीं तुम्हारी मिलती उपमा
निर्बल देह सबल आत्मा थी
मायाराम गण कमल विकासी
मदन गुरु के अन्तेवासी
गुरुओं से जो कुछ था पाया
उस पर जीवन सभी लगाया
सिंह सरीखा मन निर्भय था
चींटी पर भी करुणामय था
गुरु भ्राता मुनिराज सुदर्शन
एकमेक था दोनों का मन
दोनों कि ये इच्छा थी
मुनिओं में हो संयम वृद्धि
धर्म संघ में धर्म क्रांति हो
धर्म ध्यान हो प्रेम शांति हो
श्रमण सूर्य पर संध्या आई
बढ़ती गई और अरुणाई
चढ़ते भावो से संथारा
करके निज आत्मा को तारा
वंदन करते हम सब मिलकर
जय- जय मुनिवर जय-जय गुरुवार